Tuesday, September 13, 2016

 काम वासना और आध्यात्मिकता में सम्बन्ध
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काम से ही सब कुछ जन्मा है। पूर्वी सभ्यता में काम को दैवीय सन्मान दिया गया है। काम वासना दुसरे चक्र में होती है, और फिर आप ऊपर उठते है, अगले चक्रों ही ओर। इसलिए ये प्रक्रिया मात्र है।

आध्यात्मिकता किसी को भी अस्वीकार नहीं करती, न ही अपने आप को किसी से अलग करती है। आध्यात्मिकता के घेरे में जीवन का हर पहलू आता है। वास्तव में, आध्यात्मिकता ही हमे काम वासना से ऊपर उठा कर उच्चतर चेतना की ओर ले जाती है।

काम में शरीर के किसी भाग के प्रति आसक्ति होती है तथा उससे कुछ उत्तेजना होती है। काम का लक्ष्य आनंद की प्राप्ति है, सिर्फ वासना नहीं। यह वर्तमान क्षण में आने की प्रक्रिया है, सब कुछ भूल जाना और आनंद पाना। आध्यात्मिकता वह आनंद प्रदान करती है, जो किसी क्रिया ने नहीं प्राप्त होगा अपितु इंद्रियों से परे है।

श्रीमद भागवद गीता में ऐसा उल्लेख है, "बुद्धि गृह्यं अतिन्द्रियं", वह आनंद है जो बुद्धि से प्राप्त होता है, परंतु उसकी प्राप्ति इंद्रियों से परे की बात है, और यही परमानन्द है। उदाहरणतः, जब आप किसी प्रिय से लंबे समय पश्चात् मिलते हैं, या उनके बारे में सिर्फ कल्पना मात्र करते है, आपके अंदर कुछ होता है। यह गहरे प्रेम का बोध है। यह किसी भी प्रकार से स्पर्श या गन्ध से नहीं जुड़ा, या किसी भी प्रकार के शारीरिक गुण से नहीं जुड़ा; इन्द्रियां इसमें कहीं भी सम्मिलित नहीं है। एक विचार या अनुभूति, अंदर ही अंदर कुछ प्रकाशित कर देती है और आपको आनंद और उत्साह का अनुभव होता है। और कुछ नहीं, कोई स्पर्श का सुख, यह आनंद नहीं दे सकता। ऐसा माना जाता है, की एक क्षण की समाधि ( गहरे ध्यान की स्तिथि) से मिला आनंद, काम से मिले आनंद से 1000 गुना अधिक है। उससे भी अधिक।

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