ज्ञान के मोती
.यह शरीर संसार का है| संसार से आया है,संसार में वापस जाएगा| तो इस शरीर को संसार से, समाज से, दुनिया से अलग कभीनहीं कर सकते - और यह संसार इस शरीर की जरुरत को पूरा करने के लिए सब कुछ करता है| इसी तरह से हमारी जो आत्मा है,हमारी जो चेतना है, मन है - ये ईश्वर से कभी अलग हो ही नहीं सकता, आप चाहो भी तब भी यह अलग हो नहीं सकता|
तो "मेरा मन मेरी आत्मा ईश्वर का है, ईश्वर में ही है और रहेगा" - इतना समझ के विश्राम करिये, तो ध्यान अपने आप हो जाता है|
मैं ईश्वर का हूँ और शरीर समाज का है| और समाज ईश्वर का है; जब समाज ईश्वर का समझते हैं तो सेवा करिये और हम ईश्वर के हैं ऐसा समझ के मस्ती करिये|
.यह शरीर संसार का है| संसार से आया है,संसार में वापस जाएगा| तो इस शरीर को संसार से, समाज से, दुनिया से अलग कभीनहीं कर सकते - और यह संसार इस शरीर की जरुरत को पूरा करने के लिए सब कुछ करता है| इसी तरह से हमारी जो आत्मा है,हमारी जो चेतना है, मन है - ये ईश्वर से कभी अलग हो ही नहीं सकता, आप चाहो भी तब भी यह अलग हो नहीं सकता|
तो "मेरा मन मेरी आत्मा ईश्वर का है, ईश्वर में ही है और रहेगा" - इतना समझ के विश्राम करिये, तो ध्यान अपने आप हो जाता है|
मैं ईश्वर का हूँ और शरीर समाज का है| और समाज ईश्वर का है; जब समाज ईश्वर का समझते हैं तो सेवा करिये और हम ईश्वर के हैं ऐसा समझ के मस्ती करिये|
मैं ईश्वर का हूँ समझने के बाद क्या कोई कमी लगेगी जीवन में? नहीं, यह असम्भव है ! मैं ईश्वर का हूँ, ईश्वर मुझ में हैं - तो
तृप्ति है|समाज ईश्वर का है तो फिर समाज सेवा ही पूजा बनती है | इतनी सी धारणा और ज्यादा कुछ जानने की आवश्यकता भी नहीं है कि “शरीर संसार का है और इस शरीर की जरूरतों को समाज पूरा करेगा” | जब आप छोटे बच्चे थे; आप अपने आप थोड़ी ही न स्वबलंबी/स्वतंत्र थे - किसी ने आप को बड़ा किया - समाज ने तो आप को सब कुछ दिया| शरीर के तौर पर हम हमेशा पराबलंबी बने रहेंगे और आत्मा के तौर पर हम सदास्वावलंबी बने रहेंगे| और जब इन दोनों को हम जान लेते हैं तो शांत होते हैं व तृप्त होतेहैं| और जब शांत और तृप्त होते हैं; तो जो चाहिए वो चीज़ें अपने आप होने लगता है|आपमें से कितने लोगों के सारे काम हो रहें हैं? (सारे लोग हाथ उठाते हैं)
.
यही भक्त का लक्षण है - जो वह चाहता है, वह पूरा हो जाता है| इसलिए कहते हैं कि भगवान भक्तों के नौकर/दास हैं - मालिक नहीं हैं| ज्ञानियों के मालिक हैं, लेकिन भक्तों के नौकर/दास है| और जो भगवान है सो गुरु है|
.
प्रश्न : गुरूजी, कहते हैं कि कर्म करते समय इच्छा का त्याग कर कर्म करना चाहिए| औरकोई भी कर्म करने से पहले संकल्प करना चाहिए| तो क्या इच्छा और संकल्प में कुछ अंतर है?
.
श्री श्री रवि शंकर : हाँ| संकल्प वही है कि एक इच्छा उठी - उसको विसर्जन किया,समर्पण किया - संकल्प से ही सारी सृष्टि है संकल्प से सब कुछ चलता है| जब अंतर्मुखी होना हो तो हमें संकल्प छोड़ के अंतर्मुखी होना पड़ेगा| जब अंतर्मुखी होने के बाद फिर बाहर समाज में काम करना हो तो संकल्प लेकर काम करना पड़ेगा| इसलिए इच्छा भी करिये, कामना भी करिये लेकिन सत्य-कामा बनो - मतलब सत्य का संकल्प लीजिए; तो वह प्रवृति में होता है| निवृति में निष्काम और प्रवृति में निष्काम कर्म| इन दोनों का योग होना चाहिए| निष्काम और कर्म योग दोनों साथ होने चाहिए| यह दोनों अलग अलग लगते हैं मगर पूरक हैं - कर्म योग और निष्कामता|
जैसे कोई बड़ा इमारत खड़ी करनी होती हो तो नींव पहले खोदनी पड़ती है| जितनीऊँचाई पर जाना होता है उतना नीचे जाना पड़ता है| उसी तरह से निष्काम जितने होतेहैं, उतने हम सत्य-काम, सत्य संकल्प और कर्म योगी बन सकते हैं|
No comments:
Post a Comment