Saturday, April 23, 2016

प्र : भूतकाल को छोड़ना और समर्पित करना इतना मुश्किल क्यों है? मैं क्या करूँ?
श्री श्री रवि शंकर : कुछ मत करो| बस अतीत में रहो| भूतकाल में जीना इतना आसान नहीं है| उसे स्वीकार करो, उसका 

सामना करो| तुम ठीक जगह पर हो| अतीत को समर्पित करना, उससे भागने की कोशिश करना नहीं है| ठीक है, आगे बढ़ो|

अतीत को दोनों हाथों से गले लगाओ| अनुभवों से गुज़रने में कोई हर्ज़ा नहीं है | उनसे डरो मत| तुम उन्हें संभाल सकते हो| उसे

टालते रह कर या उससे नफरत करके तुम उसे दूर नहीं भगा सकोगे|

कोई एक पुस्तक तैयार कर रहा है जिसमें समर्पण के पांच स्तरों का वर्णन है| तुम समर्पण की क्या परिभाषा करोगे? कई 


बार समर्पण शब्द का दुरुपयोग हुआ है| पहले प्रकार का समर्पण असफलता के समय आता है| जब तुम हार जाते हो, तब दुखी

 हो जाते हो और सब कुछ छोड़ देते हो| जब जीवन ज़्यादा करके किसी हार को लेकर एक बोझ हो, तब जैसा है वैसे छोड़ देते हैं
,
 ये एक तरह का समर्पण है| दुसरे प्रकार का समर्पण प्रेम से आता है जैसे माँ का प्रेम होता है| माँ के लिए और किसी चीज़ का 

महत्त्व नहीं है| अगर उसे खुद के और बच्चे के सुख के बीच में चुनना हो तो वह बच्चे का सुख चुनेगी| पति-पत्नी के बीच 

 प्यार  


 का रिश्ता होता है, वे एक दुसरे के साथ बिलकुल आराम से, निडर और बेफिक्र होते हैं| माँ बच्चे से इतनी जुडी हुई होती है, वो 

बच्चे से इतना प्यार करती है कि बच्चे के लिए वह छोटी-छोटी सुविधाएं और अपने सुख ख़ुशी से छोड़ देती है| तीसरे प्रकार का 
समर्पण ज़्यादातर ज्ञान से आता है| आपको पता है कि वैसे भी कुछ नहीं है| आप जब इश्वर को समर्पण कर देते हो तब ऐसा 

होता है| चौथे प्रकार का समर्पण है - ये जानना कि सब भ्रम है| ये सोचना कि तुम्हें कुछ छोड़ना है जो तुम्हारे पास है ही नहीं, ये

 भ्रम ही है| ये बुद्धिमता का समर्पण है| ये एक आराम की स्थिति है जिसमें हम जानते है कि सब कुछ एक का ही है| इस तरह

 के समर्पण की स्थिति एक ही जगह पहुंचाती है - जहाँ छोटा मन तुम्हारे विशाल 'स्वरूप' की ओर खुलता है|

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